Sunday, 21 February 2021

जय-जय-जय चापलूस महाराज

जय-जय-जय चापलूस महाराज 
स्वाभिमान ना आता तुमको रास।
पिछल्ले बने घूमते तुम 
नहीं रुकता कभी 
तुम्हारा कोई काज ।
गुडबुक्स में ऊपर रहते तुम 
बॉस करता तुम पर नाज़ ।

सिक्के के दोनों पहलू तुम्हारे 
चापलूसी,व्यवहार-कुशल 
दोनों चित पट नारे-वारे ।

शहद में 
डूबो-डुबोकर निकलती 
वाणी तुम्हारी ।
हर पक्ष में आती 
हामी तुम्हारी ।

स्वाभिमान का परित्याग ।
स्वार्थ ही परमार्थ ।
अपना उल्लू सीधा करने में ...
तलवे चाटना नहीं लगता भारी।

हम तो देते तुम्हें एक ही नाम ...
बिन पेंदी का लोटा
जो किसी का ना होता 
बस...
ढलमलाता 
एक कोने से दूसरे कोने तक 
जब तक पूर्ति ना हो जाए स्वार्थ।

ऐसे लोग धूर्त,पाखंडी,धोखेबाज होते हैं।।

।।सधु चन्द्र।। 
चित्र - साभार गूगल

43 comments:

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    1. हार्दिक आभार माननीय सादर नमन।

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    1. हार्दिक आभार मनीषा जी सादर।

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    2. There is no need to thank you, because you deserve it.

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    3. लेकिन मेरी कविता जो मेरे blog पर कृपया एक बार देख लीजिए please🙏🙏🙏🙏🙏

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  3. बिल्कुल सही आकलन ! पर यह प्रजाति भी आदिकाल से अस्तित्व में है

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    1. हार्दिक आभार माननीय।
      सादर।

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  4. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 23 फरवरी 2021 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. मेरी रचना को मंच प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार दिव्या जी।
      सादर।

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  5. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (23-2-21) को 'धारयति इति धर्मः'- (चर्चा अंक- 3986) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

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    1. मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु हार्दिक आभार कामिनी जी।
      सादर।

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  6. चापलूसों की बढ़िया आरती उतारी है आपने। आपको बधाई।

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  7. वाह👌👌👌 रोचक और सटीक चापलूस वंदना सधू जी!! अहम हिस्सा है ये चाटुकार ज़िंदगी का। हार्दिक शुभकामनाएं इस दिलचस्प रचना के लिए🌹🌹

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    1. Please see my blog http://oyfdvb.blogspot.com/2021/02/blog-post_33.html

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    2. हार्दिक आभार रेणु जी।
      सादर।

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    1. हार्दिक आभार माननीय।
      सादर।

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  9. Replies
    1. हार्दिक आभार माननीय।
      सादर।

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  10. सुन्दर प्रस्तुति.

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    1. हार्दिक आभार माननीय।
      सादर।

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  11. क्या खूब लिखा है सधु जी ! हम जैसे लोगों का तो यह भोगा हुआ यथार्थ है ।

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    1. हार्दिक आभार माननीय।
      सादर।

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  12. प्रशंसा और चापलूसी के बीच एक बहुत महीन रेखा है.
    न जाने कब स्वामिभक्ति चाटुकारिता का जमा पहन ले.

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  13. करारा व्यंग्य! खरी खरी ।
    सुंदर सृजन।

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  14. बहुत खूब....
    चाटुकारों का लाजवाब चरित्र चित्रण...
    बधाई सधु चन्द्र जी 🌹🙏🌹

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  15. Replies
    1. आप से निवेदन है,कि हमारी कविता भी एक बार देख लीजिए और अपनी राय व्यक्त करने का कष्ट कीजिए आप की अति महान कृपया होगी

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    2. हार्दिक आभार माननीय।
      सादर।

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  16. सटीक व्यंग्य... लाजवाब सृजन ।

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  17. आपकीे रचना  वास्तविकता की परिचयात्मक भेंट है।

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