Wednesday, 3 March 2021

अंतर्मन को छूना, प्रहार से भारी है

हथौड़ी के बार-बार प्रहार करने पर
ताला खुलता नहीं टूट जाता है। 
 निरंतर वार पर जब
 अभिमानी ताला न खुला 
तब हथौड़ी ने, 
चाबी के पास जाकर पूछा...
तुम ऐसा क्या करती हो!!!
जो कि मेरे प्रहार से संभव नहीं!!!
चाबी ने कहा...
 तुम बाह्य प्रहार करते हो पर मैं...
 अंतर्मन को छूती हूँ।

अंतर्मन को छूना, प्रहार से भारी है।
।।सधु चंद्र।।

चित्र-साभार गूगल

हे मन उठ !

स्वारथ सकल पूरित शोरगुल-कोलाहल।
धैर्य मन पीता
नितदिन हलाहल।।
हे मन उठ !
चल क्रान्ति ला।
लोहे को लोहे से काट
जग में शान्ति फैला।।

प्रातर्वन्दन 🙏🙏🙏🙏💐


।।सधु चन्द्र।। 

Sunday, 28 February 2021

आर्थिक निर्भरता क्यों?

आर्थिक रूप से कमजो़र होना ही 
महिला के लिए अभिशाप है।

स्त्री विमर्श से बाहर निकलना 
इतना आसान नहीं...
यह अच्छा है वह बूरा 
काम करने की जरूरत क्या है!!! 
पति की इनकम तो इतनी अच्छी है 
तुम्हें क्या जरूरत आन पड़ी !!!
किस चीज कमी है!! 
अपने घर का ख्याल रखो।

वह सब तो सही है ...
पर... एक महिला ही समझ सकती है 
महिला के दिल का हाल...
जब जरूरत पड़ती है तो 
फैलाना पड़ता है हाथ।

भाई साहब! 

बिना वेतन के 
24 घंटे का काम नहीं दिखता 
बस... क्या करती हो!!!
यही ध्वनि कान में बार-बार है गूंजता।।


।।सधु चन्द्र।।

Friday, 26 February 2021

समस्या

दुनिया के साथ समस्या यह है कि 
बुद्धिमान लोग संदेह से भरे हैं जबकि
मूर्ख लोग आत्मविश्वास से।
: वुकोव्स्की :

अब आपकी समझ आपके हाथ  जो समझो😊

Tuesday, 23 February 2021

कारपोरल पनिशमेंट वर्जित

मनुष्य और पशु में 
बड़ा अंतर है 
हिंसा-अहिंसा का।

जहाँ मनुष्य वाणी से 
भावनाओं को अभिव्यक्त करता है, 
वही पशु हिंसा द्वारा ।

सुना है आपके पास पर्याप्त डिग्रियाँ हैं
और मनुष्य के रूप में भी 
अवतार लिया है आपने 
जो कि सृष्टि का 
बुद्धिमान जीव कहलाता है ।

यदि पेड़-पौधों के पास 
पर्याप्त फल हो तो वे 
लदकर झुक जाते हैं 
समर्पित हो जाते हैं ।

कुएं में पर्याप्त पानी हो तो वह 
आपकी पहुंच तक आ जाता है ।
नदियों में पर्याप्त जल हो तो 
खेत-खलिहान लहलहाने लगते हैं।

ख़ुद को योग्य समझने वाले 
क्या लाभ आपके ज्ञान का !!!
जब अंधकार में 
प्रकाश न पहुंचे
और बच्चे आतंकित हों आपके कोप से...।

शिक्षक रोल मॉडल होते हैं उनका  एक ही उद्देश्य और एक ही लक्ष्य होना चाहिए बच्चों में ज्ञान बांटना न कि शारीरिक दंड बांटना। ज्ञान बढ़ाइए कोप नहीं।

।।केवल अपवाद रुपी शिक्षक के लिए।।

।।सधु चंद्र।।
 चित्र - साभार गूगल




Sunday, 21 February 2021

जय-जय-जय चापलूस महाराज

जय-जय-जय चापलूस महाराज 
स्वाभिमान ना आता तुमको रास।
पिछल्ले बने घूमते तुम 
नहीं रुकता कभी 
तुम्हारा कोई काज ।
गुडबुक्स में ऊपर रहते तुम 
बॉस करता तुम पर नाज़ ।

सिक्के के दोनों पहलू तुम्हारे 
चापलूसी,व्यवहार-कुशल 
दोनों चित पट नारे-वारे ।

शहद में 
डूबो-डुबोकर निकलती 
वाणी तुम्हारी ।
हर पक्ष में आती 
हामी तुम्हारी ।

स्वाभिमान का परित्याग ।
स्वार्थ ही परमार्थ ।
अपना उल्लू सीधा करने में ...
तलवे चाटना नहीं लगता भारी।

हम तो देते तुम्हें एक ही नाम ...
बिन पेंदी का लोटा
जो किसी का ना होता 
बस...
ढलमलाता 
एक कोने से दूसरे कोने तक 
जब तक पूर्ति ना हो जाए स्वार्थ।

ऐसे लोग धूर्त,पाखंडी,धोखेबाज होते हैं।।

।।सधु चन्द्र।। 
चित्र - साभार गूगल

Monday, 15 February 2021

सर्द ओस में सिमटे ख़्याल तेरे लिहाफ से निकल बाहर जाते नहीं...

सर्द ओस में सिमटे ख़्याल तेरे 
लिहाफ से निकल बाहर जाते नहीं ।

 लिफाफे के बाहर जो पड़ा है ख़त 
उस ख़त में ऐसा तो कुछ लिखा  नहीं ।
जैसा कि हाथ फेर महसूस.... किया मैंने ।

बहुत रहस्यमयी है 
यह टुकड़ा कागज़ का...।
पता नहीं... 
जो मैंने सोचा 
वह तुमने कहा ! 
या कहा नहीं !

सर्द ओस में सिमटे ख़्याल तेरे 
लिहाफ से निकल बाहर जाते नहीं ।

*****************************************

बहुत ख़ूबसूरत,तिलस्मी है 
झरोखा तेरी यादों का ।
भले बंद हो पलके मेरी 
पर यादों का सिलसिला जाता नहीं ।
कपड़ों को तह करते-करते 
यादों की तहे खुल जाती हैं
और कब तह हो जाती हैं यादें तुम्हारी  
कपड़ों की तहों में 
पता नहीं...!

।।सधु चन्द्र।। 
चित्र - साभार गूगल 

Tuesday, 9 February 2021

धैर्य,क्षमा हो कब तक!!!

धैर्य,क्षमा हो कब तक!!!
अनजाने में हो गलती जब तक ।
किंतु धृष्टता ना हो स्वीकार,
जब जानकर करे कोई 
गलती बार-बार।।

भले... गहना बल का है क्षमा
किन्तु
नहीं हर बार।
अन्त होना अनिवार्य तब
जब शिशुपाल करे
अति... जब-तब।


।।सधु चन्द्र।। 

Saturday, 6 February 2021

एक आंतरिक द्वंद्व ... और मैं कवि बन जाता हूँ

 एक आंतरिक द्वंद्व , 
युद्ध अंदर
मस्तिष्क और हृदय के बीच निरंतर।

एक बढ़ता अविरल
शांति-पथ पर 
किन्तु, एक पुनः 
किसी प्रेम-विश्वास के पथ पर ।

कभी अनुभव होता निर्बल
तो कभी दुगना सबल ।
कभी भारी और भारी 
रात्रि सताती
तो कभी चांदनी का स्पर्श 
हल्का कर, थकान मिटाती ।

कभी अधरों पर फीकी मुस्कान 
तो कभी भीतर पीड़ा की खान ।

कभी सूखी धरती 
तो कभी भीगा आसमान ।
कभी आत्मा का तत्व शुष्क 
फिर भी सजल नैनो का 
न होता सत्व विलुप्त ।

कभी कोमल हृदय 
तो कभी हृदय प्रस्तर।

पर, कभी ऐसा भी होता है जब...
सुखी आँखें, होठों पर खींची मुस्कान
किन्तु भीगा मन, 
मुखमौन 
चीख- चीख कर करता बखान...
तब मैं कवि बन जाता हूँ...।

जब मेरे भीतर की उष्मा तेज होती है 
जब मेरे भीतर अतीत 
वर्तमान से द्वंद्व  करता है 
जब सुकोमल मन पर कोई 
हथौड़ी की चोट करता है 
तब मैं कवि बन जाता हूँ।। 

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र - साभार गूगल 

Wednesday, 3 February 2021

चलो एक कहानी लिखें ...संवेदनाओं को अपनी ज़ुबानी लिखें...

 सुनो...!
चलो एक कहानी लिखें 
हाट बाज़ार से इतर
संवेदनाओं को
अपनी  ज़ुबानी लिखें।

अक्षर की कटारों में
समय की धार लिखें।
छांव के नाम लिखें...
इज़हार-ए-मुहब्बत धूप का।
ज़रूरत आन पड़ी तो...
आग को आधार लिखें।

चलो एक कहानी लिखें 
संवेदनाओं को
अपनी  ज़ुबानी लिखें।

बर्तनों की ठनठनाहट 
सितारों की जगमगाहट को
न अशरफ़ियो के नाम लिख दें ।

ये जो कुहासा छाया है  
महामारी का ...!!!
उसे चीरते ...
सर्द फाहों पर
अपनी संगत की 
दिवानगी लिख दें ।

चलो एक कहानी लिखें 
संवेदनाओं को
अपनी  ज़ुबानी लिखें।

कुछ तुम कहो 
कुछ मैं ।
कुछ तुम सुनो 
कुछ मैं ।
तुम लिखो 
कुछ मैं ।
ढलते सूरज की तरह 
ज़िन्दगी के भोर की...
रवानगी लिख दें ।

चलो एक कहानी लिखें 
संवेदनाओं को
अपनी  ज़ुबानी लिखें।

।।सधु चन्द्र।।

चित्र  - साभार गूगल

Sunday, 31 January 2021

एक वक़्त था कि प्रेम-पत्र लिखे जाते थे ...

एक वक़्त था कि 
प्रेम-पत्र लिखे जाते थे ।
संकोचवश
मन की बात जो
अधरों तक ना आ पाती 
उसे शब्दों में पिरोए जाते थे।

सुख-दुख आनन्द-पीड़ा 
शब्दों में उकेरे जाते थे ।

यह प्रेम-पत्र ही था 
जिसे वापस मांगते समय 
प्रेमिका 
फूट-फूट कर रोया करती थी ।
और...
यह प्रेम-पत्र ही था जिसे 
गंगा में प्रवाहित कर 
प्रेमी 
आश्वस्त करता 
अपने पावन प्रेम को।


आज की भांति उस समय भी 
हर विषय के गुरु हुआ करते थे ।
यद्यपि पत्र का प्रारूप होता है ।

इसे अक्षरस: सत्य करता 
इसका स्वरूप होता है ।
इसलिए...
एक स्कूल,एक कोचिंग ,एक कॉलेज के
सारे प्रेम-पत्र लगभग 
एक ही प्रारूप में 
एक ही गुरु के मार्गदर्शन में 
लिखे जाते।
कभी कविता 
कभी लेख 
कभी आवेदन को 
जज्बातों की ओखली में कूट कर 
रंगीन स्याही से लबालब रसोई में परोसे जाते।

सिलेक्शन रिजेक्शन के 
कई चरण 
इस दरमियां आते।

यह प्रेम पत्र ही था जो 
असफल प्रेमी को 
सफल शायर बना दिया करता था 
वरना... 
प्रेम की इतनी मजाल कि ...
टूटे दिल का मुशायरा कर ले।।

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र -साभार गूगल 

Friday, 29 January 2021

दूसरी पारी अब भी है शेष ...

अमावस्या की रात 
जो चल रही है ...
ना मशाल लेकर 
राह दिखाएगा कोई ।

एक ज्योतिपुंज जो 
जल रही है भीतर तेरे 
मझधार में बन पतवार
पार लगाएगी वही ।

तू चल ...
ना रूक...
बेड़ियों,जंजीरों को तोड़ 
भारी पैर से अटल हो 
मंजिल को अपनी ओर मोड़ ।

तू शूल में भी फूल खिलाने में सक्षम
प्रतिकूल को भी अनुकूल बनाने में सक्षम

क्या हुआ !!!
जो पहली पारी रुक गई ...
दूसरी पारी अब भी है शेष ।
जो होगा तेरे लिए विशेष।।


।।सधु चन्द्र ।।

चित्र - साभार गूगल 

Monday, 25 January 2021

जागो!हे ! हिंद वासियों,पावन इस गणतंत्र पर्व पर।

जागो!
हे ! हिंद वासियों,
पावन इस गणतंत्र पर्व पर।

कुछ लोग 
चंद सिक्के फ़ेककर 
फ़ुसला रहे हैं ।
अवनी की रत्न-राशि लूटते 
पृष्ठ को पुष्ट करते 
प्रजातंत्र में राजतंत्र का 
भोग लगा रहे हैं।

जागो!
हे ! हिंद वासियों,
पावन इस गणतंत्र पर्व पर।

समता को मिटा 
विषमता को फैला रहे 
ये वही है जो...
मौलिक अधिकारों का गला घोटते
निरंतर घोटाले किए जा रहे।

पर कौन...!?
स्वयं सोचे और विचारें ।।
कि आख़िर कौन  है जो...
समाधान और व्यवधान के 
बीच के अंतर को मिटा रहे हैं 
पुण्य भूमि को युद्धभूमि
बना रहे हैं...। 

जागो!
हे ! हिंद वासियों,
पावन इस गणतंत्र पर्व पर।

क्योंकि 
जागरण ही एक निदान है 
तभी होता कर्तव्यों का ज्ञान है। 

अभिमान  हो  देश का केवल 
अधिकारों का ऐसा भान लिए ।

सबका सबसे रहे अनुराग 
भ्रष्टाचार जाए भाग 
शिक्षा,ज्ञान साथ में दान 
जीवट मन आभार लिए ।

जागो!
हे ! हिंद वासियों,
पावन इस गणतंत्र पर्व पर।

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र - साभार गूगल 

Thursday, 21 January 2021

निशा का एक पहर अभी बाकी है...

गतिमान पथिक
हम दोनों
और प्रभाकर का 
तेज... प्रबल 
शिकन धुले 
कुछ थकान लिए
अविरल,अविचल,अथक,सबल ।

गरल-तमस को चीरता 
अधरों पर मुस्कान 
अभी ताज़ी है  
कोई राग तो अलापो...
चातक मन प्रतीक्षारत
निशा का एक पहर
अभी बाकी है...।

।।सधु चन्द्र।।

चित्र-साभार गूगल  

घड़ी 🕒 की सुइयाँ उल्टी नहीं चला करतीं...!!!

समय कई जख़़्म देता है 
इसलिए 
घड़ी में फूल नहीं काटें होते हैं।
यूँ तो ...
घड़ी सुधारने वाले 
कई मिल जाएंगे 
पर... 
समय में सुधार 
ख़ुद करना होता है।
और...
इस दुनियाँ में 
कुछ भी बेमतलब नहीं... 
ये बंद घड़ी 🕒 भी 
हरदिन
दो बार सही वक़्त दिखा जाती है। 
बस...अब अमल ख़ुद करना है 
सीख अब ख़ुद लेनी है।
वे लोग
स्वयं फ़ूल बन जाते हैं 
जो समय रहते 
अपनी भूल नहीं सुधारते 
क्योंकि...
घड़ी 🕒 की सुइयाँ 
उल्टी नहीं चला करतीं...!!!

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र-साभार गूगल 

Tuesday, 19 January 2021

सबसे बड़ी भेंट

'प्रेम' और 'सम्मान'
दुनियाँ  की  सबसे बड़ी भेंट है। 
किसी को प्रेम व स्नेह देना 
जितना बड़ा उपहार है ।
उससे कहीं बड़ा 
उसे पाना साक्षात् ...
आत्मसम्मान है ।।
*************************

जिंदगी में कितना... क्या है!!! ?
यह मायने नहीं रखता 
बल्कि ...
आपके जीवन में 
कौन कितना समर्पित है!!!
यह मायने रखता है।
***************************

कुछ लोग
सीमित संसाधन में भी 
प्रफुल्लित रहते हैं...
पूर्ण रहते हैं ।
पर कुछ भरे पूरे...
खाली जीवन लिए 
सर्वदा अपूर्ण रहते हैं। 

 ।।सधु चन्द्र।। 

चित्र - साभार गूगल 

Monday, 18 January 2021

भूख इतनी न जगाओ कि ...झमाझम बारिश में भी प्यास ना बुझे ...!

ज़िंदगी का दूसरा नाम 'जिंदादिली' है। 
जो कि बा-मुश्किल लोगों को मिली है।
बिन बारिश भी जो खुद को 
सूखने ना दे, 
पतन होने न दे 
उसी का नाम हरियाली है ।
जिसके लिए स्थिरता चाहिए 
संयम, ठहराव चाहिए। 
भूख इतनी न जगाओ कि ...
झमाझम बारिश में भी 
प्यास ना बुझे ...!
अपने भीतर के पानी को 
इतना न गिराओ कि
मर्यादा  न सूझे...!
वरना ...
सूखे पत्ते की तरह गिर जाओगे ...
और कई लोग हैं 
तुम्हारे नक्श-ए-क़दम पर चलने वाले 
जो तुम्हें ढेर कर आग लगा जाएंगे।
और तुम खुद को जलता हुआ पाओगे।।

।।सधु चन्द्र।।

चित्र - साभार गूगल 

Sunday, 17 January 2021

दास नहीं हो सकता उदास ...

दुर्योधन ने श्री कृष्ण की 

पूरी नारायणी सेना मांग ली

और अर्जुन ने  

केवल श्री कृष्ण को मांगा ।

उस समय...

भगवान श्री कृष्ण ने 

अर्जुन की चुटकी (मजाक) लेते हुए कहा कि 

हार निश्चित है तेरी 

हरदम रहेगा उदास 

माखन दुर्योधन ले गया 

केवल छाछ बची तेरे पास ।

अर्जुन ने कहा- हे प्रभु! 

जीत निश्चित है मेरी 

दास नहीं हो सकता उदास 

माखन लेकर क्या करूं!!? 

जब माखन चोर है मेरे पास।।🙏🙏🙏


चित्र-साभार गूगल

 

Friday, 15 January 2021

मुफ़्तखोरी लोगों को कामचोर और देश को कमज़ोर बनाता है...

जाति विशेष पर टिप्पणी 
नहीं होनी चाहिए। 
जाति लिखी गाड़ियाँ भी सीज कर लो
अच्छी बात है !!!
पर... 
जाति प्रमाण पत्र बनाना भी तो  बंद करो। 🙏
जाति देखकर 
सरकारी सुविधा देना भी बंद करो
जनता को कुछ भी
 मुफ़्त में मत दो।
केवल शिक्षा, न्याय, इलाज ही
मुफ़्त में मिलनी चाहिए।
क्योंकि... 
मुफ़्तखोरी लोगों को कामचोर 
और देश को कमज़ोर बनाता है।

।।सधु चन्द्र।। 


बड़े नसीब से मिलते हैं..

हो आपके क़रीब
या हो आपसे दूर
पर... फ़िक्र हो जिन्हें 
हर पल आपका हुज़ुर
क़दर करें उनकी 
भावनाएँ हों ऐसी जिनकी
क्योंकि
ख़याल रखने वाले 
फ़िकर करने वाले 
इज्ज़त देने वाले 
बड़े नसीब से मिलते हैं..
कदर कीजिए ।

प्रातर्वन्दन 🙏🙏🙏💐

Thursday, 14 January 2021

मकर-संक्रांति की अनन्त शुभकामनाएँ

कर्क  से मकर में 
प्रवेश करती राशि
कई संकेतों को दर्शाती है

है सूचक यह परिवर्तन का
सभी को निद्रा से जगाती है।

यह संक्रांति विशेष है जो
तमस  की देह पर   
आलोक सूरज
का सजाता है।
खिचड़ी भोग 
कुटिया और महल
को भी मिलाता है।
दिवस की यात्रा 
लम्बी निशा को
यही घटाता है।।

दान का इसलिए है पर्व
जगे देव का व्यवहार।
गंगा तीर्थ अवगाहन पावन
संस्कृति संस्कार।।

पूर्व गोलार्ध  शनि सुत से मिलने
 आ रहे  दिनमान।
पतंगों की फुलवारी गगन
का व्यक्त ये आभार।।

मकर-संक्रांति की अनन्त शुभकामनाएँ

चित्र- साभार गूगल 

Monday, 11 January 2021

हर दिन हिंदी दिवस मनाएँगे....

तन हिंदी 
मन हिंदी 
और यह जीवन 
हिंदी हो जाए ।

गोते लगाए बस 
हिंदी में 
आ... विदेश से लौट 
फिर स्वदेशी हो जाए ।।

एक चाहत है 
जड़ों की 
बस... हिंदी से ही 
उसे सींचा जाए।
 
जन-जन की भाषा हिंदी हो 
और ...
हिंदी ही
पहली भाषा कहलाए ।

तमस मिटे 
अज्ञान का
ज्योतिर्मय 
ज्ञान बिखर जाए।

अलख जगे और गूंज उठे 
जन-गण-मन हिंदी हो जाए।

पर याद रहे... 
बस एक दिन के लिए न...
माँ के चरणों में स्थान पाएँगे
बल्कि...
हर दिन 
हिंदी दिवस मनाएँगे....


।।सधु चन्द्र।। 

चित्र-साभार गूगल 


Saturday, 9 January 2021

उन्मुक्त मन का आयतन...

उन्मुक्त मन का आयतन
उस निर्धारित परिमाप से
कहीं विस्तृत ....
जिसे नियति ने नियत किया
पर  हर  दिन उस स्वप्निल
उड़ान को जी लेती...
जिसे तुम्हें ले देखा है...।

बस 'तुम' और 'मैं' का साथ
'हम' को प्रबल बनाता है
हर जंग में जीत का
परचम फैलाता है।

निश्चय ही ...

इस विस्तृत आकाश में
बाहें फैलाए
एक- एक सोपान पर
पदार्पण कर लेंगे।
निरंतर अभ्यासरत... 
बस...एक अवसर मिले!

जड़ें मजबूत करते
गगन भी पार कर लेंगे।
अक्षर की कटारों में
समय से धार कर लेंगें।
बस...एक अवसर मिले!

छांव से नाम लिख देंगे
धूप के इज़हार में अपना
अगर होगी ज़रूरत आग
को आधार कर लेंगे।।

क्योंकि
उन्मुक्त मन का आयतन
उस निर्धारित परिमाप से
कहीं विस्तृत ....है। 

।।सधु चन्द्र।। 

Friday, 8 January 2021

ईर्ष्यालुओं को सादर नमन🙏



दुनियाँ में ईश्वर का आभार 

अभिव्यक्त करने के 

कई कारण हो सकते हैं ।

पर ... हे ! ईश्वर 

आपका विशेष आभार

कि आपने कुछ 

ऐसे उत्कृष्ट लोगों को बनाया कि

जिससे लोग बराबरी करना 

शान समझ सकें 

और नहीं तो 

उस विशेष के प्रति 

औरों का समर्पण देख 

द्वेष-ईर्ष्या कर सकें।

ताकि उन ईर्ष्यालु विशेष

पैंतीस आर-पार में भी

तीव्र हार्मोनल परिवर्तन हो सके । 😊

अब इनमें परिपक्वता तो 

आ नहीं सकती 

तो कम से कम ये स्वस्थ रह सकें

और निरंतर ईर्ष्या कर सकें  ।😀😀😀

अनुमानतः

वे ईर्ष्या कर यह जताते हैं कि 

वे कितने अधूरे...

कितने असंतुष्ट है.. 

और बराबरी की होड़ में 

प्रतिद्वंदिता से बहुत पिछड़े हुए हैं।

सामना करना उनके वश में नहीं 

तो चलो ईर्ष्या कर लें,

टाँग खींच दें।

उन ईर्ष्यालुओं को सादर  नमन।🙏


तुच्छ मेधा  द्वारा इनका आकलन  

कुछ इस प्रकार है ।इनमें -

निरीक्षण करना

तुलना करना

निगरानी करना

 और सबसे ऊपर

चुप रहना व दुखी होना जैसे ...

भार को ढो 

अमिट छाप  छोड़ना हैं...। 🤗


 हे ! ईश्वर 

है  ईर्ष्या रूपी अंधेरा 

अब प्रेम का प्रकाश निकलना चाहिए।

हो जिस तरह भी 

पर यह द्वेष  रूपी मौसम 

बदलना चाहिए।।🙏🙏


।।सधु चन्द्र।। 


चित्र-साभार गूगल 

Thursday, 7 January 2021

😁ज़रा हँस भी लो😛😛😛😁😁😁

😁😛                 😛😛            😁😁😁

 बहस करने से रिश्ते कमजोर होते हैं 

इसलिए!!! 

तुरंत झापड़ मार कर रिश्ते मजबूत करें।😁😁😁😛😛😛😛

नारी न सोहा नारी का रूपा ...😉

नारी न सोहा
नारी का रूपा ...😉😛

विडंबना ~~~•😛😛😛

चित्र-साभार गूगल 

टूटने और बिखरे की परिभाषा हमेशा 'समाप्त' होना नहीं होता

टूटने और बिखरे की परिभाषा 
हमेशा 'समाप्त' होना नहीं होता ।
कभी -कभी टूटने और बिखरे से 
जीवन का 'आरंभ' भी होता है।।

नदी की राह में 
चट्टान के गिर जाने से 
रास्ता बंद नहीं हुआ करता ।
कभी-कभी 
रुख मोड़ कर भी 
राह निकल जाया करती है।।

यह ना समझना कि 
यह 'अनंत
स्वयं  ही प्रभावी बना है...
हर बार 'अंत' ने 
इसे सहारा दिया है।।

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र-साभार गूगल 

Wednesday, 6 January 2021

कपड़े और चेहरे अक्सर झूठ बोला करते हैं


इस दुनिया में 
तीन तरह के लोग हैं 
शुद्ध, अशुद्ध, मिलावटी
किंतु यह दौर है 
केवल मिलावट का।

इस मिलावट के दौर में 
कौन सच बोलता है !!!
पता नहीं। 
साक्षात् दिखने वाले
कपड़े और चेहरे 
अक्सर झूठ  बोला करते हैं ।
इनके साथ 
हाँ में हाँ मिलाने वाले की भी 
कमी नहीं 
खैर!!! 
मनुष्य की वास्तविकता तो 
समय ही बताता है।
अगर हम 
अपने बीते हुए कल के
हर एक क्षण से 
कुछ -कुछ नया 
सीखना शुरू कर दे 
तो ...
आने वाले कल के 
हर एक पल को ...
खुशहाल बना सकते हैं
सौगात बना सकते हैं।।

।।सधु चन्द्र।। 




 


Tuesday, 5 January 2021

मेरे ज्ञान का हो यह प्रतिफल ...

जीवन का एक ही उद्देश्य है 
एक ही लक्ष्य ~~
मेरी शिक्षा, 
मेरे ज्ञान का हो यह  प्रतिफल 
कि याद करे दुनिया ,
मेरे बाद भी मुझे कल।
ना मेरा चेहरा
न मेरी बातें 
उन्हें याद रहे बस...
 मेरा काम  मेरी यादें!!!

।।सधु चन्द्र।। 

Monday, 4 January 2021

धुली-धुली नई सुबह से हाथ मिला लो

धुली-धुली
नई सुबह से 
हाथ मिला लो।
पिछली वाली 
काली-काली
रात भुला दो।

जगी उमंगे हैं
 फिर से... 
उल्लासों से 
उन्हें  सजा दो ।
चूर-चूर  जिससे
तन-मन था वो
आघात भुला दो।

कलुष झरें 
किसलय अनुरागी
कन्ठ लगा लो।
नाराज़ी की ऊँची-नीची
बात  भुला दो।

अभिनन्दन यूँ करें परस्पर
नये वर्ष का
फटे-फटे रिश्तों की हर
सौगात भुला दो।।
शुभकामनाएँ
प्रातर्वन्दन 🙏🙏🙏🙏

Sunday, 3 January 2021

हवा पर दस्तख़त की किसी ने ...

हृदय उर्मियों का विस्तार 
हो रहा दूर-दराज़ 
फिर हवा के झोंकों में
हो विलीन 
जल से करता एकाकार ।

कि आज दस्तक दी किसी ने 
हवा पर दस्तख़त की किसी ने ।।

उन्मुक्त गगन में 
चंचल मन 
उड़ता जाता क्षितिज पार ।
अंतस से उठती तरंग 
तेज गति से ...
चाप पर न पाता नियंत्रण 
बारम्बार ।
आरोह-अवरोह 
पर लगा टेक
मनोभाव बना देता 
सामान्य को कलाकार 

कि आज दस्तक दी किसी ने 
हवा पर दस्तख़त की किसी ने ।।

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र - साभार गूगल 


Friday, 1 January 2021

नया साल है...


आरंभ का अंत 

और 

अंत से आरंभ हो जाना 

नया साल है।


दिन का रात 

और 

रात का दिन हो जाना 

नया साल है ।


उदय का अस्त 

और

अस्त का उदय हो जाना 

नया साल है।


टहनियों पर 

खिले फूल का झड़ जाना 

और 

उन्हीं  झड़े फूलों की जगह 

एक नई कली का खिल जाना 

नया साल है ।


आत्मा का 

निश्चित रह जाना और 

शरीर रूपी वस्त्र का

 बदल जाना

नया साल है ।


तो आओ ...

एक बताशे-सी मुस्कान 

इन लबों पर ले आए।

मुंह मीठा खुद करें 

दूसरे भी बस ~~~

मीठे-मीठे हो जाएँ।

मंगलमय नववर्ष की अशेष शुभकामनाओं सहित 

।।सधु चन्द्र।। 

Wednesday, 30 December 2020

नववर्ष का करने कल्याण... हे शिव! मानव रूप धर तुम धरा पर कब आओगे?

ज्ञान की दुशाला तान 
अवचेतन का रखते मान 
नववर्ष में... 
अवशेषजन का करने कल्याण
हे शिव! मानव रूप धर तुम धरा पर कब आओगे?

अपने डमरू में ले डंकार 
राम-धनुष पर चढ़ा टंकार  
तिमिर में ज्योत कब जगाओगे? 
हे शिव! मानव रूप धर 
तुम धरा पर कब आओगे? 

भस्मासुर की भरी प्रजातियाँ 
मिला जिन्हें नेता का नाम 
 जोर-शोर से छल-प्रपंच का 
चल रहा यहाँ, सरोकार का काम
 हे देव सोचो !!

जनता क्यों न मचाए हाहाकार 
जब उनपर हो रहा अगाध अत्याचार।

नितदिन हो रही 
पावन गंगा की कलुषित गात 
धृष्ट अभिलाषाएँ ...न सुने बात 
विह्वल मन बस तुम्हें पुकारे ।
सुप्त जग को कब 
जगाओगे जग आओगे।।

हे शिव! मानव रूप धर 
तुम धरा पर कब आओगे?


छद्ममयी दुरात्मा का 
शीघ्र हो नाश 
बालमन मानव के बस 
तुम्हीं एक आस

हृदय कहता निश्चय ही... 
मानव रूप धर
इस नववर्ष में...
धरा पर आओगे
निश्चय ही 
धरा पर आओगे।।

मंगलमय नववर्ष की अशेष शुभकामनाएँ ✨✨💐💐

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र-साभार गूगल 

Tuesday, 29 December 2020

ममता की छाँव में

ममता की छाँव में कोमल तल-झाड़ियाँ भी बने शूल।
माँ तेरी ही अनुकंपा है जो 
विपरीत परिस्थिति में भी
सब  हो जाए अनुकूल।।
प्रातर्वन्दन🙏🙏🙏
।।सधु।। 

चित्र - साभार गूगल

यूँ हँस-हँस कर क्यों सुनाते हो!


मेरी बीती बात ज़माने को
यूँ हँस-हँस कर 
क्यों! सुनाते हो।
मैं जो हंस दूंगा... 
तो तुम रो दोगे।।

।।सधु चंद्र।। 

सर्वाधिकार

Monday, 28 December 2020

मरण या स्मरण!

स्वयं के लिए 
जीने वाले का 
'मरण' होता है ।
दूसरे के लिए 
जीने वाले का तो 
हमेशा ही 'स्मरण' होता है।

'प्राप्त' को 'पर्याप्त' समझने वाला ही
संतोषी 'सुखी' होता है
वरना..
ज़्यादा और ज़्यादा के 
ज़हरीले भूख में 
इंसान अक्सर 'दुखी' होता है।


Saturday, 26 December 2020

हमारी आवाज हमारे मनोभाव की उपज...

हमारी आवाज
हमारे मनोभाव की उपज है।
 हम जैसा सोचते हैं 
वह विचार बनकर 
हमारे शब्दों के माध्यम से 
अभिव्यक्त होता है।

यदि भीतर क्षमा हो 
तो क्षमा निकलेगी ।
और यदि भीतर 
क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या,अहंकार 
रूपी आडंबर,गंदगी भरी है
तो जिह्वा मूल से वही निकलेगी ।

इसलिए 
जब भी कुछ बाहर निकले 
तो उसका दोष 
किसी और पर न मढ़ें...
क्योंकि यह हमारी ही थाती है 
जिसको हम अपने भीतर छुपाए बैठे हैं।।

केवल ऊँचा मकान बनाने से 
कोई ऊँचा नहीं होता ।

 केवल बड़ी गाड़ी लेकर 
बड़ी-बड़ी बातें करके
कोई बड़ा नहीं होता।

 उसकी सोच,उसके विचार 
उसके ऊँचे एवं बड़े होने का
 निर्धारण करते हैं।

अगर ऊँची रखनी हो तो 
सोच ऊँची रखनी चाहिए
 ना की आवाज।
 क्योंकि आवाज ऊंची होगी 
तो कुछ लोग सुनेंगे 
पर बात ऊँची होगी 
तो बहुत लोग सुनेंगे।

।।सधु चन्द्र।। 

Friday, 25 December 2020

पंडित के घर ईसा मसीह का अवतार।

तुम्हारा जन्म में एक उत्सव है
जन्म का क्षण...
धर्मनिरपेक्षता रूपी उपहार
जहाँ पंडित के घर हुआ,ईसा मसीह का अवतार।

आज दहाई में 
प्रवेश कर गए तुम। 
अपनी ख़ुशियाँ 
बयाँ नहीं कर सकती
जो...
स्मृतियों की 
उन पीड़ाओं से 
कहीं ऊपर है
जिसे पहली बार 
तुम्हे स्पर्श व आलिंगन से मिली।

युग-युग जियो मेरे लाल !

तुम ही हो 
कल के कर्णधार 
तुम कीर्ति हो,पर्व हो...
ज्योति हो ज्वाला बनो।
उज्ज्वलता का वेश धरो।

देश के उत्तराधिकारी हो
न तुम थमों, न तुम रुको 
प्रपञ्च में न तुम पड़ो
 चले चलो, चले चलो 
आगे बढ़ो, बढ़े चलो....... 

तुम्हारी माँ
।।सधु चन्द्र।। 

Wednesday, 23 December 2020

बस विमर्शों में आग🔥 लगकर क्या होगा ?

मैं न ही कोई पत्रकार 
न ही मिडिया से है साठ-गांठ 
आवाम की दबी-कुचली आवाज़
मैं आपको  सौपती हूँ।

क्योंकि...

मैं आग बेचती हूँ
न कि राख बेचती हूँ।

यदि राख भी बेचा 
तो समझना कि आग है बेचा
बूझे आग में सुलगा हुआ
राख बेचती हूँ ।
हाँ ! मैं आग बेचती हूँ

आवाम की दबी-कुचली आवाज़
मैं आपको  सौपती हूँ।

जहाँ आग 🔥 तो लगी है 
पर राख न दिखा 
जो कुछ स्वाहा हुआ 
उसपर अख़बार ख़ूब बिका।

पर जो... 
अधजला कचरे का अंबार 
अब भी था... कोने में 
उसे उठाने वाला 
सिलसिलेवार ना दिखा।
 
फ़ायर ब्रिगेड वाले भी आए थे 
तप्त-अग्नि को शांत करने 
पर... राख के भीतर का उन्हें, 
अनबुझा,उद्दीप्त
आग न दिखा ।

पसरा सन्नाटा 
यहाँ भी लोलुपों के नाम चढ़ा 
सत्ताधारियों एवं 
समाज सुधारकों का चिट्ठा 
यहाँ ख़ूब बिका।

मुँह दबाकर रो रही थी
अधजली वस्तुएँ
उन्हें सुनने वाला 
कोई विश्वविधाता न दिखा। 

सुना है!
आजकल 
ख़ूब आग लगती है 
विमर्शों  में।
हाँ विमर्शों में ...

पर, बस विमर्शों में 
आग🔥 लगकर क्या होगा ?
आग तो लगनी चाहिए 
सबके सीने में 

महज़ ...
सीने की आग ही
एक ढर्राए पिरामिड को 
भस्म कर
फिर से खड़ा कर सकती है
एक सपनों का महल ।।

क्योंकि... कागजी दस्तावेज एवं वास्तविक इमारत में 
सपने और हक़ीक़त सा ही फ़र्क है।

।।सधु।। 

Tuesday, 22 December 2020

यह वक़्त का ही खेल है कि जिसने परखना और समझना सीखा दिया...

अपने  जैसा ढूंढते-ढूंढते 
जमाना निकल गया 
कुछ अपने 
पराए बन गए 
कुछ पराए 
अपने ।

यह वक्त का ही खेल है 
कि जिसने
परखना और समझना 
सीखा दिया।
परखा तो 
कोई 
अपना ना दिखा 
और...
समझा तो 
कोई पराया ना दिखा।

बस ज़िंदगी ने 
यही सिखाया है कि 
जबरन की डोर 
ना बांधे चलो।
कदर ना हो तो 
चुपचाप 
दूरी बना लो 
और निकल चलो 
अपने मकान पर।

।।सधु चन्द्र।। 


Monday, 21 December 2020

रंग-बिरंगे सजीले सपने

रंग-बिरंगे सजीले सपने 
कभी आंखो के भीतर से 
झांकते, 
इधर-उधर 
कभी अभ्यासरत 
ढुलक जाते 
आंखों की कोरों से 

जिन्हें सहेज 
अंक में ले 
वापस भरने वाला 
समर्थवान 
कोई नहीं।

कभी ये सपने 
शून्य में जागते 
धैर्य के साथ 
इंतजार में 
वापस होने के लिए ।

अपने प्रस्ताव की 
किलकारियों
अठखेलियों को
गति में देखने के लिए 
उस सुखद एहसास को

जो...
भाप बनकर उड़ गए 
आकाश में 
और बन गए बादल ।

आज वह  बादल  
उमड़ घुमड़ रहे 
सिर के ऊपर 
आकाश में...

मन होता कि भीग जाए 
उस बारिश में ...
जो मेरी सौजन्य से 
ऊपर तक बादलों का ढेर बना पाए हैं ।

और जिसे 
निरंतरता देने में 
अभ्यासरत रही...!

पता है कि ये 
कुछ आस-पास छटकेंगे
पर...
कुछ तो कभी बरसेंगे...!
और तृप्त करेंगे सपने को।

इसी चाह में
यह चातक मन 
उसे अपलक देख रहा है।।


।।सधु चन्द्र।।

Tuesday, 15 December 2020

नशेड़ी ज़िंदगी

 नशेड़ी ज़िंदगी

ज़िंदगी एक लत है 
उस नशे कि...
जो रोज़-रोज़ 
माँगती है 
अपनी ज़रूरतों को ।

हर ज़रूरत नशा नहीं 
पर जो ज़रूरत नशा बन जाए 
वही लत है।

किसकी क्या ज़रूरत!  
यह उससे बेहतर 
कौन जाने!
जिसे पूरे करने में वह 
लांघ जाता है सारी सीमाएं 
और मुहैया कराता है 
अपने उस उपादान को।

लत कभी बुरी नहीं होती 
पर... 
केवल लिप्त शख़्स के लिए ।

कुछ लतें अच्छी होती हैं 
कुछ बहुत अच्छी
पर...
कुछ सड़ा देती हैं 
साथ में बंधे संबंधों को।

कहते हैं कि 
नशे में डूबा इंसान 
सच बोलता है...
पर मनोभावानुसार...
सबसे अधिक 
मिलावटी शब्दभाव 
नशे की हालत में ही 
बोले जाते हैं 
ताकि... 
लोग उस पर यक़ीन कर सकें 
और वह 
गुमराह कर सके लोगों को।

इंसान शब्द जंजाल से 
मुक्त होना चाहता है ।

मुक्त होना चाहता है...
उस घुटन से 
जो,नशे की हालत में 
सामक्षी को झकझोर देते हैं।

यह घुटन 
किसी अच्छे नशे की ओर संकेत न कर 
गर्त में घसीटने का काम करता है ।
कोशिश करें उत्थान की..
न कि पतन की। 

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र-साभार गूगल

Friday, 11 December 2020

लफ्ज़-ए-करम

लफ्ज़ !
कहे जाते हैं ।
लफ्ज़ !
सुने जाते हैं ।

कुछ लफ्ज़
कहे नहीं 
समझे जाते हैं 
महसूस किए जाते हैं। 

कुछ लफ्ज़
एहसास  के अनुरूप 
ढाले जाते हैं ।

पहल के लिए 
ज़रूरत होती
लफ्ज़-ए-करम  की। 

पर...
 उनके लफ्ज़-ए-करम तो देखिए...
मैंने कुछ कहा भी नहीं
और... 
उन्होंने तो 
पहल भी कर दिया!

।।सधु चन्द्र।। 

Wednesday, 9 December 2020

आंखों के भीतर रंग-बिरंगे सजीले सपने

रंग-बिरंगे सजीले सपने 
कभी आंखो के भीतर से 
झांकते, इधर-उधर 
कभी अभ्यासरत ढुलक जाते 
आंखों की कोरों से 
जिन्हें सहेज 
अंक में ले 
वापस भरने वाला 
समर्थवान 
कोई नहीं।

कभी ये सपने 
शून्य में जागते 
धैर्य के साथ 
इंतजार में 
वापस होने के लिए ।

अपने प्रस्ताव की 
किलकारियों
अठखेलियों को
गति में देखने के लिए 
उस सुखद अहसास को
जो...
भाप बनकर उड़ गए 
आकाश में 
और बन गए बादल 
आज वह  बादल  
उमड़ घुमड़ रहे 
सिर के ऊपर 
आकाश में ।

मन होता कि भीग जाए 
उस बारिश में ...
जो मेरी सौजन्य से 
ऊपर तक बादलों का ढेर बना पाए हैं ।

निरंतर अभ्यासरत हूँ...
उन बादलों के निर्माण में ।
पता है कि कुछ 
आस-पास छटकेंगे
पर...
कुछ तो कभी बरसेंगे...!
और तृप्ति करेंगे सपने को
यह चातक मन 
उसे अपलक देख रहा है।।

।।सधु चन्द्र।।  

चित्र-साभार गूगल

Tuesday, 8 December 2020

तुलसी वृक्ष ना जानिये

तुलसी वृक्ष ना जानिये

"तुलसी वृक्ष ना जानिये।
गाय ना जानिये ढोर।
गुरू मनुज ना जानिये।
ये तीनों नन्दकिशोर।

   अर्थात-
तुलसी को कभी पेड़ ना समझें
गाय को पशु समझने की गलती ना करें और 
गुरू को कोई साधारण मनुष्य समझने की भूल ना करें,
क्योंकि ये तीनों ही साक्षात भगवान रूप हैं"।

Monday, 7 December 2020

वाचाल नैनों के बीच, मूक जिह्वा की भाषा

न वर्ण 
न शब्द 
न लिपि
न व्याकरण ज्ञान।
न जाने कौन सी है यह भाषा!!!

बिन आला लगाए
अनुभव करता 
एक-एक स्पंदन
हृदय का...

अभिव्यक्ति रहित 
नजर से चढ़
हृदय में उतरती।
भाव को भापती।

विस्मयकारी 
आह्लादित
चमत्कृत करती।
दो लोगों के बीच की यह भाषा 

वाचाल नैनों के बीच
मूक जिह्वा की भाषा 
न जाने कौन-सी है यह भाषा!!!
जो अथाह  
शब्द भंडार को भी 
निःशब्द कर देती है ....!

।।सधु चन्द्र।। 


आला - स्टेथोस्कोप

Sunday, 6 December 2020

दूसरे के बच्चे ने की तो गलती और...अपने बच्चे ने की तो नासमझी

एक ही काम  
अगर ...
दूसरे के बच्चे ने की तो गलती 
और...
अपने बच्चे ने की तो नासमझी 
कहलाती है।

एक ही प्रतिपक्षता ...
अपनों ने  किया तो विरोध 
दूसरों ने किया तो 
धृष्टता कहलाती है।

एक ही धूल-मिट्टी 
अगर ...
किसान के हाथों लगे तो माटी 
और...
शहरी परंपरा में 
धूल गंदगी कहलाती है।

परिवर्तन...
सोच में होनी चाहिए 
दिल में होनी चाहिए 
दिमाग में होनी चाहिए।
शब्द के भाव में परिवर्तन 
इंसान को पक्षपाती बना देता है ।।

।।सधु चन्द्र।। 

Friday, 4 December 2020

शुद्ध चैतन्य... इनकी वाणी साफ़, सीधी, स्पष्ट पर कठोर होती है

भाषा मनुष्य के चलता संग
यह एक ऐसा अदृश्य अंग 
जो स्पष्ट तौर पर 
मानवों का आवंटन कर
छवि को दिखाता है ।

कोई... शुद्धता
कोई ...मिलावट
 कोई ...अवसरवाद को 
दिखाता है। 

पहले  स्थान पर आने वाले लोग 
अत्यंत शुद्धता के कारण 
कच्चे सोने की तरह  
जीवन में मुलायम रह जाते हैं।

 दूसरे स्थान पर आने वाले लोग  
शुद्ध सोने में सुहागे से मिल 
और चमक जाते हैं।

तीसरे स्थान पर आने वाले लोग 
बस देखने में शुद्ध सोने की तरह होते हैं 
किंतु परखने पर वह 
नकली निकल जाते हैं।

 इनमें...
जीवन में सबसे अधिक सफलता 
दूसरे नंबर वाले लोग पाते हैं।

 तीसरे नंबर वाले 
अवसरवादिता के कारण 
अपने वक्तव्य से मुकर जाते हैं ।
विश्वासघाती के नाम से 
मशहूर हो जाते हैं
इसलिए जीवन में आगे बढ़कर भी 
पिछड़ जाते हैं।

पहले नंबर पर आने वाले व्यक्ति 
भले सफलता में अपना 
परचम ना फैला पाए 
पर ...विश्वसनीयता
शुद्धता के कारण
 वास्तविकता से गहरा नाता।
बस...
शुद्ध चैतन्य
इनकी वाणी 
साफ़, सीधी, स्पष्ट 
और कठोर होती है।
किंतु ऐसा व्यक्ति किसी को धोखा नहीं देता।

।।सधु चन्द्र ।।

बहुमान्य किंवदंती है वाल्मीकि दस्युकर्मकार(डाकू) थे....!

आदिकाव्य रामायण के रचनाकार वाल्मीकि के विषय में बहुमान्य किंवदंती है कि रत्नाकर डाकू ने नारद मुनि के मार्गदर्शन में दस्युकर्म(डकैती करना)छोड़ एकान्तवास में मरा-मरा कहना शुरुकर दिया जिसे वह राम-राम जपते थें।
लेकिन रामायण में स्वयं वाल्मीकि जी ने लिखा है कि-

प्रचेतसोहं दशमाः 
पुत्रो रघवनंदन ।
मनसाकर्मणा वाचा,
भूतपूर्व न किल्विषम।।
हे राम मैं प्रचेता मुनि का दसवां पुत्र हूँ और राम मैने अपने जीवन में कभी पापाचार कार्य नहीं किया है।
          विचारणीय जिसका पिता स्वयं एक ऋषि हो उसकी संतान भरण-पोषण हेतु डाकू कैसे बन सकता है!!!
अतः दस्युकर्मकार की यह कथा यहाँ खंडित होती है।ये मिथ्या किंवदंतियाँ कितनी भ्रमित व प्रश्नचिह्न खींचतीं हैं न!!!

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र - साभार गूगल

Thursday, 3 December 2020

जीवन की सीख ...रहीम के दोहे

 चित्र-गूगल

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥
रहीम ने अपने इस दोहे में प्रेम की नाजुकता के बारे में बताया है। उनके अनुसार प्रेम का बंधन किसी नाज़ुक धागे की तरह होता है और इसे बहुत संभाल कर रखना चाहिए। हम बलपूर्वक किसी को प्रेम के बंधन में नहीं बाँध सकते। ज्यादा खिंचाव आने पर प्रेम रूपी धागा चटक कर टूट सकता है। प्रेम रूपी धागे यानि टूटे रिश्ते को फिर से जोड़ना बेहद मुश्किल होता है। अगर हम कोशिशें करके प्रेम के रिश्ते को फिर से जोड़ लें, तब भी लोगों के मन में कोई कसक तो बनी ही रह जाती है। दूसरे शब्दों में, अगर एक बार किसी के मन में आपके प्रति प्यार की भावना मर गई, तो वह आपको दोबारा पहले जैसा प्यार नहीं कर सकता। कुछ न कुछ कमी तो रह ही जाती है।

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहै कोय॥
 रहीम ने अपने इस दोहे में  हमें रहीम जी ने बहुत ही काम की सीख दी है। जिसके बारे में हम सब जानते हैं। रहीम जी इन पंक्तियों में कहते हैं कि अपने मन का दुःख हमें स्वयं तक ही रखना चाहिए। लोग ख़ुशी तो बाँट लेते हैं। परन्तु जब बात दुःख की आती है, तो वे आपका दुःख सुन तो अवश्य लेते हैं, लेकिन उसे बाँटते नहीं है। ना ही उसे कम करने का प्रयास करते हैं। बल्कि आपकी पीठ पीछे वे आपके दुःख का मज़ाक बनाकर हंसी उड़ाते हैं। इसीलिए हमें अपना दुःख कभी किसी को नहीं बताना चाहिए।

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥
 प्रस्तुत पंक्तियों में कवि हमें यह शिक्षा देते हैं कि एक बार में एक ही काम करने चाहिए। हमें एक साथ कई सारे काम नहीं करने चाहिए। ऐसे में हमारे सारे काम अधूरे रह जाते हैं और कोई काम पूरा नहीं होता। एक काम के पूरा होने से कई सारे काम खुद ही पूरे हो जाते हैं। जिस तरह, किसी पौधे को फल-फूल देने लायक बनाने हेतु, हमें उसकी जड़ में पानी डालना पड़ता है। हम उसके तने या पत्तों पर पानी डालकर फल प्राप्त नहीं कर सकते। ठीक इसी प्रकार, हमें एक ही प्रभु की श्रृद्धापूर्वक आराधना करनी चाहिए। अगर हम अपनी आस्था-रूपी जल को अलग-अलग जगह व्यर्थ बहाएंगे, तो हमें कभी भी मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता।

चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस।
जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस॥
इन पंक्तियों में रहीम जी ने राम के वनवास के बारे में बताया है। जब उन्हें 14 वर्षों का वनवास मिला था, तो वे चित्रकूट जैसे घने जंगल में रहने के लिए बाध्य हुए थे। रहीम जी के अनुसार, इतने घने जंगल में वही रह सकता है, जो किसी विपदा में हो। नहीं तो, ऐसी परिस्थिति में कोई भी अपने मर्ज़ी से रहने नहीं आएगा।

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं।
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं॥
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने हमें एक दोहे की महत्ता के बारे में बताया है। दोहे के चंद शब्दों में ही ढेर सारा ज्ञान भरा होता है, जो हमें जीवन की बहुत सारी महत्वपूर्ण सीख दे जाते हैं। जिस तरह, कोई नट कुंडली मारकर खुद को छोटा कर लेता है और उसके बाद ऊंचाई तक छलांग लगा लेता है। उसी तरह, एक दोहा भी कुछ ही शब्दों में हमें ढेर सारा ज्ञान दे जाता है।

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पियत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय॥
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर दास जी कहते हैं कि वह कीचड़ का थोड़ा-सा पानी भी धन्य है, जो कीचड़ में होने के बावजूद भी ना जाने कितने कीड़े-मकौड़ों की प्यास बुझा देता है। वहीँ दूसरी ओर, सागर का अपार जल जो किसी की भी प्यास नहीं बुझा सकता, कवि को किसी काम का नहीं लगता। यहाँ कवि ने एक ऐसे गरीब के बारे में कहा है, जिसके पास धन नहीं होने के बावजूद भी वह दूसरों की मदद करता है। साथ ही एक ऐसे अमीर के बारे में बताया है, जिसके पास ढेर सारा धन होने पर भी वह दूसरों की मदद नहीं करता।

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन देत समेत।
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत॥
यहाँ पर कवि ने स्वार्थी मनुष्य के बारे में बताया है और उसे पशु से भी बदतर कहा है। हिरण एक पशु होने पर भी मधुर ध्वनि से मुग्ध होकर शिकारी पर अपना सब कुछ न्योछावर कर देता है। जैसे कोई मनुष्य कला से प्रसन्न हो जाए, तो फिर वह धन के बारे में नहीं सोचता, अपितु वह अपना सारा धन कला पर न्योछावर कर देता है। परन्तु कुछ मनुष्य पशु से भी बदतर होते हैं, वे कला का लुत्फ़ तो उठा लेते हैं, परन्तु बदले में कुछ नहीं देते।

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
रहीम जी ने हमें जीवन से संबंधित कई शिक्षाएँ दी हैं और उन्ही में से एक शिक्षा यह है कि हमें हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि कोई बात बिगड़े नहीं। जिस प्रकार, अगर एक बार दूध फट जाए, तो फिर लाख कोशिशों के बावजूद भी हम उसे मथ कर माखन नहीं बना सकते। ठीक उसी प्रकार, अगर एक बार कोई बात बिगड़ जाए, तो हम उसे पहले जैसी ठीक कभी नहीं कर सकते हैं। इसलिए बात बिगड़ने से पहले ही हमें उसे संभाल लेना चाहिए।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि॥
 रहीम जी ने हमें इस दोहे में जो ज्ञान दिया है, उसे हमें हमेशा याद रखना चाहिए। ये पूरी जिंदगी हमारे काम आएगा। रहीम जी के अनुसार, हर वस्तु या व्यक्ति का अपना महत्व होता है, फिर चाहे वह छोटा हो या बड़ा। हमें कभी भी किसी बड़े व्यक्ति या वस्तु के लिए छोटी वस्तु या व्यक्ति की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। कवि कहते हैं कि जहाँ सुई का काम होता है, वहां पर तलवार कोई काम नहीं कर पाती, अर्थात तलवार के आकार में बड़े होने पर भी वह काम की साबित नहीं होती, जबकि सुई आकार में अपेक्षाकृत बहुत छोटी होकर भी कारगर साबित होती है। इसीलिए हमें कभी धन-संपत्ति, ऊँच-नीच व आकार के आधार पर किसी चीज़ की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

रहिमन निज संपति बिना, कौ न बिपति सहाय।
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय॥
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि हमसे कह रहे हैं कि जब मुश्किल समय आता है, तो हमारी खुद की सम्पत्ति ही हमारी सहायता करती है। अर्थात हमें खुद की सहायता खुद ही करनी होती है, दूसरा कोई हमें उस विपत्ति से नहीं निकाल सकता। जिस प्रकार पानी के बिना कमल के फूल को सूर्य के जैसा तेजस्वी भी नहीं बचा पाता और वह मुरझा जाता है। उसी प्रकार बिना संपत्ति के मनुष्य का जीवन-निर्वाह हो पाना असंभव है।

रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥
रहीम जी ने अपने दोहों में जीवन के लिए जल के महत्व का वर्णन किया है। उनके अनुसार हमेशा पानी को हमेशा बचाकर रखना चाहिए। यह बहुमूल्य होता है। इसके बिना कुछ भी संभव नहीं है। बिना पानी के हमें न मोती में चमक मिलेगी और न हम जीवित रह पाएंगे। यहाँ पर मनुष्य के संदर्भ में कवि ने मान-मर्यादा को पानी की तरह बताया है। जिस तरह पानी के बिना मोती की चमक चली जाती है, ठीक उसी तरह, एक मनुष्य की मान-मर्यादा भ्रष्ट हो जाने पर उसकी प्रतिष्ठा रूपी चमक खत्म हो जाती है।

Tuesday, 1 December 2020

वास्तविक आकर्षण

यह आवश्यक नहीं कि ...
उम्र होने से ही 
ज्ञान की प्राप्ति हो 
या हाथ जला कर ही
अग्नि की अनुभूति हो।

"न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्षयते"

अनुभवशीलता, चिंतनशीलता 
एक ऐसी परंपरा है 
जो कि अपने अनुभव से  
अपने बाल सफेद करते हैं
न की धूप में।

सजने-संवरने
ख़ूबसूरत लगने में 
कोई बुराई नहीं  
वह तो आकर्षण का केंद्र है ।
पर... 
चेहरे को केवल मेकअप से 
ढक लेने से कोई 
ख़ूबसूरत नहीं होता
और ना ही आकर्षक;
रंगे सियार के आगे 
मुंह खोलने से पहले भी
सोचना पड़ता है कि 
वह दिल से सुन रहे हैं 
या दिमाग से।

जिसमें खुद इतनी मिलावट है 
 क्या वह शुद्धता को 
 ग्रहण कर सकेंगे!!!!

वास्तव में आप बेफ़िक्र...  
शालीनजनों के साथ होते हैं ।

क्योंकि ...
वास्तविक आकर्षण,अपनत्व 
उसकी सादगी, उसकी शालीनता है।
हमारा ज्ञान ,आयु एवं अभ्यास 
सभी तब तक शून्य 
व उथले हैं 
जबतक हममें  
वास्तविकता नहीं 
शालीनता नहीं
गंभीरता नहीं । 
वजन नहीं। 
विनम्रता नहीं।

  अतः बाहरी झूठे दिखावेपन से अपने साथ दूसरों को भी भ्रमित व आक्रामित नहीं करना चाहिए।

।।सधु चन्द्र।। 

चित्र-साभार गूगल

Monday, 30 November 2020

अनर्थ को ललकारने से बचना


                   

                       
हूँ सहनशील पर,                       
इतना नहीं कि
राह के पाषाण की तरह
कोई ठोकर मार दे...
और,
ढलमलाते 
एक कोने से...
दूसरे कोने में जा गिरे...।

है धैर्य बेहद मूल्यों का
पर, 
इतना नहीं कि;
समक्षी 
अपनी नैतिकता गटक जाए
और ताकते मुंह रह जाएं
चिर -चिरंतर तक।

है प्रवृति खुशमिजाज
सहृदय  सी 
पर,
इतना नहीं कि;
धृष्टों की धृष्टता पर
झूठी हंसी आए।
मित्रवत् व्यवहार किया जाए

दोमुहें सांपो के भीड़ में खड़ी,
लिए कटोरा दूध का
पर खबरदार!!!
अनर्थ को ललकारने से बचना।

हूँ नम्र पर 
इतना नहीं कि
नरम समझकर
खीरे- ककरी की तरह 
चबा जाओ.....
..........................................
पैर के नीचे से 
ज़मीन खीचनें की 
औका़त हम रखते हैं।

।।सधु चन्द्र।।

Sunday, 29 November 2020

किसकी बदौलत है तुम्हारी थाली में रोटी !!!


किसकी बदौलत है
तुम्हारी थाली में रोटी 
क्या तुम्हारे दांत हैं 
अशरफिया चिबोती!!! 

लक्ष्मी की थाती 
संभालने वाले, 
कुबेर का 
इतना होता मान ।
पर, अन्नपूर्णा की थाती 
संभालने वाले 
किसान का 
होता घोर अपमान।

आख़िर क्यों? 

मैं हूँ एक किसान।
लकड़ी के घुन की तरह 
चाटा जा रहा एक सामान।  

अपने पसीने से सींच
 फ़सल को
देता सबको अनाज़।
पर खुद ही दाने-दाने को
हो  जाता मोहताज़। 

हो गया खोखला 
भीतर से 
अपनी ज़रूरतों को मारता
अपनी विवशता को 
अपने ही भीतर झांकता ।

हाँ!  मैं हूँ एक किसान।
देश का अभिमान ।

ज़रूरतें  नगण्य हमारी
एवज में बर्बरता भारी 
तरसता, गिड़गिडा़ता 
छोटी-छोटी 
ख़्वाहिशों को 
क्या विधि से पाया हमने यही विधान!!
क्योंकि ...
मैं हूँ एक किसान।।

।।सधु चन्द्र।।

चित्र- साभार गूगल 

जब हों सब विरुद्ध⏳और आप रफ़्तार में...

जब हों सब विरुद्ध⏳
और आप रफ़्तार में...
तो समझिए कि
मंजिल की ओर ही 
रूख़ है ।

बस रुकना मना है... 
अमावस्या की रात 
जो चल रही 
न मशाल लेकर राह 
दिखाएगा कोई ।

एक ज्योतिपुंज 
जो जल रही है 
भीतर तेरे...
 मझधार में 
बन पतवार 
पार लगाएगा वही ।

तू चल 
ना रुक 
बेड़ियों, जंजीरों को तोड़ 
मंजिल को 
अपनी ओर मोड़ ।

क्या हुआ जो पहली पारी रुक गई
 दूसरी अब भी है बाकी /शेष ।
 होगा यह तेरे लिए विशेष ।।
क्योंकि,               
जहाजें...🛥✈️
विपरीत दिशा को चीरते ही
आगे बढ़ती हैं।
और बढ़ती चली जाती हैं....

।।सधु।। 

Saturday, 28 November 2020

ये वक्त ही है जो फैसले और फ़ासले लेकर आता है ...


दुनिया मैं सबसे दुर्लभ है- जीवन 
 इसका महत्वपूर्ण अंग - वक्त ।

यह वक्त  इतना कठिन नहीं कि 
जटिलताओं को सरलता में 
न बदला जा सके।

वक्त तो होता ही है 
बदलने के लिए 
पर इसी वक्त में लोगों को 
परखना भी पड़ता है ।

ये वक्त ही है जो 
फैसले  और फ़ासले 
लेकर आता है ।

काँच के टुकड़े और हीरे में 
फ़र्क बतलाता है।

ये ऐसे हैं हर्फ़
जिसमें बस, 
मात्रा का ही है फ़र्क 

बाकी इनके जड़ 
गहरे रूप से जुड़े हैं 
जब भी लोग 
अपनी बात लेकर 
अड़े हैं।

हांँ! पर, 
कुछ रिश्ते संजोने के लिए 
झुकना पड़ता है ।
कुछ रिश्ते संजोने के लिए 
खुद को दुख देना भी पड़ता है ।
कुछ रिश्ते सजोने के लिए 
बंधना पड़ता है 
बंधन में ।

क्योंकि... 
यह बंधन ही है जो 
मज़बूती से बांधे रखती है 
विपरीत समय में लोगों को।

यह बंधन ही है जो 
जो दूर रखती है
आस-पास कचरे से अपनों को ।

क्योंकि ...
झाड़ू के बंधन खुलने के साथ ही 
वह कूड़ा कहलाता है
और ढेर कर दिया जाता है 
किसी कूड़े के अंबार पर।

।।सधु।। 

चित्र -साभार गूगल

कुछ न कहने की भी कुछ वजह होती है

कुछ न कहने की भी कुछ वजह होती है।
 बेवजह तो हवाएँ भी नहीं चला करती।।

।।सधु।। 

हृदयस्थल की सिलवटें कहाँ दिखेंगी तुम्हें~~~

हृदयस्थल की सिलवटें कहाँ दिखेंगी तुम्हें~~~
तुम्हारी दृष्टि नयनों के नीचे जाती हीं कहाँ है!!!

।।सधु।। 

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Friday, 27 November 2020

दंतहीन शब्दों की दो अलग बातें

दंतहीन शब्दों की 
 दो अलग बातें

मन में उतरना 
और मन से उतरना 
दो अलग बातें हैं।
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पानी गिरना 
एवं पानी का गिरना 
दो अलग बातें हैं ।
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मुँह उतरना 
और मुंँह से उतरना 
दो अलग बातें हैं।
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ऐसे कई शब्द है जिनकी 
बातें तो होती हैं 
होती रहेंगी 
शब्दों के अर्थ 
निकलते रहेंगे 
पर कभी यह अर्थ 
अनर्थ भी कर जाते हैं 
ये शब्द ही हैं  
जो दंतहीन होकर भी  
कई दाँतों के साथ 
प्रहार करते हैं 
आपके ऊपर 
जिसका ना कोई इलाज मिलता है 
ना ही कोई औषधि  

।।सधु।। 

अंतर्मन को छूना, प्रहार से भारी है

हथौड़ी के बार-बार प्रहार करने पर ताला खुलता नहीं टूट जाता है।   निरंतर वार पर जब  अभिमानी ताला न खुला  तब हथौड़ी ने,...