Wednesday, 14 October 2020

ज़र्रा -ज़र्रा

 गढ़ रही हूँ खुद की तकदीर 

ज़र्रा -ज़र्रा 
रंग-बिरंगी तितलियों सी 
झिलमिलाती रोशनी सी 
चौन्धियाते आँखों के आगे 
स्पीडब्रेकर  सी ....पर 
बढ़ रही हूँ  मुश्किलों को निपटाते 
ज़र्रा -ज़र्रा

जो है आज़ादी आकलन-अभिव्यक्ति की 
हूँ भरी आत्मविश्वास साहस सी 
पर ये  साहस "साहस" है
न हूँ उपद्रवी सी ...
क्योंकि ....
अब  असंभव -मुश्किल कुछ भी  नहीं 
ना डगमगाते हैं कदम 
ना थर्राते हैं बदन 
बढ़ रही हूँ परिपक्वता से आगे 
ज़र्रा-ज़र्रा।।

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